प्रकाश झा बोले - बॉलीवुड स्टार्स गुटखा बेच रहे हैं| फुर्सत मिलने पर घटिया फिल्में बना लेते हैं, जनता ने इन्हें स्टार बनाया, वही डुबो देगी |

 क्टर आमिर खान की ‘लाल सिंह चढ्ढा’, अक्षय कुमार की ‘रक्षाबंधन’ समेत कई बड़े स्टार्स की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी हैं। 9 सितंबर को आलिया भट्ट और रणवीर कपूर की रिलीज हुई फिल्म 'ब्रह्मास्त्र' का भी बायकॉट किया जा रहा है। जिसके बाद बॉलीवुड में बायकॉट कल्चर हावी हो गया है।

16 सितंबर को डायरेक्टर-एक्टर प्रकाश झा की फिल्म ‘मट्टो की साइकिल’ रिलीज हो रही है। हमने प्रकाश झा से बॉलीवुड के खिलाफ चल रहे बायकॉट ट्रेंड, वेब सीरीज ‘आश्रम’ पर उपजे विवाद समेत कई अन्य पहलुओं पर बातचीत की।

 पढ़िए पूरा इंटरव्यू:-

सवाल: लगातार फिल्मों का बायकॉट किया जा रहा है। आपको कोई डर?

जवाब: फिल्मों का हमेशा से बायकॉट होता रहा है। एक ही फिल्म को कुछ लोग पसंद करते हैं, तो कुछ नहीं। अभी ब्रह्मास्त्र को बायकॉट किया जा रहा है, लेकिन देखिए कितनी जबरदस्त ओपनिंग हुई है। एडवांस में टिकट बुक हुए। मेरी भी कई फिल्मों का बायकॉट होता रहा है।


सवाल: इन दिनों बॉलीवुड स्टार्स की भी फिल्में लगातार फ्लॉप हो रही है। क्या कारण है?

जवाब: बॉलीवुड स्टार्स तो आजकल गुटखा बेच रहे हैं। उनको जब फुर्सत मिलती है, तब कोई रिमिक्स, वाहियात फिल्म बना लेते हैं। 5-6 फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद भी इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। दरअसल, ये जवाबदेही फिल्म प्रोड्यूसर्स, कंटेंट राइटर्स और प्लेटफॉर्म (जिस मीडियम पर लोग फिल्में देखते हैं) की है।

विडंबना है कि इन्हें भी लगता है कि बड़े स्टार्स की बदौलत किसी भी फिल्म को हिट करा लेंगे, लेकिन दर्शक अच्छी स्टोरी, अपने बीच की कहानी देखना पसंद करते हैं। ये वाकई में दयनीय स्थिति है। इंडस्ट्री को अपने भीतर चिंतन करने की जरूरत है, नहीं तो जिस जनता ने इन्हें स्टार बनाया हैं, वही इन्हें डुबो देगी।

सवाल: तो क्या बॉलीवुड ने रियल कहानी दिखाना बंद कर दिया है?

जवाब: बिल्कुल, पिछले 6 महीने से जिस तरह की फिल्में आ रही हैं और दर्शक उसे बायकॉट कर रहे हैं, उससे तो यही लग रहा है। समझ में नहीं आ रहा है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री किस तरह का कंटेंट तैयार कर रही है? वो क्या बना रही है, क्या सोच रही है? वो जमीन पर है या आसमान में, या बीच में कहीं लटके हुए हैं।

जो दर्शकों के सामने परोसा जा रहा है, वो कंटेंट है ही नहीं। डायरेक्टर पैसों और स्टार्स की बदौलत रिमिक्स कंटेंट से फिल्म बना रहे हैं। दरअसल, जो लोग फिल्म बना रहे हैं, उन्हें फिल्म बनाने का कोई पैशन ही नहीं है। कंटेंट नहीं है, तो फिल्म बनाना बंद कर देना चाहिए। OTT प्लेटफॉर्म पर भी आ रहा हिंदी का कंटेंट भी उसी तरह का है। पता नहीं, कैसे अप्रूव किया जा रहा है!

सवाल: साउथ इंडस्ट्री की फिल्में बॉलीवुड के मुकाबले हिट हो रही हैं। क्या वजहें हैं?

जवाब: रीजनल सिनेमा में ऐसा शुरू से रहा है। साउथ इंडस्ट्री लगातार एक्सपेरिमेंट कर रही है, जो बॉलीवुड में नहीं है। वो ऐसी कहानियां ला रहे हैं, जो दर्शकों को लुभाती हैं।

साउथ के अलावा पंजाबी, तेलुगू, तमिल, बंगाली जैसी रीजनल फिल्मों में भी ऐसा ही है। बॉलीवुड में जो अच्छी कहानियां कहने वाले डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, राइटर हैं, उन्हें तो कोई पूछता ही नहीं है।

सवाल: डायरेक्टर एम गनी की 'मट्टो की साइकिल' पहली फिल्म है, जब आपके पास प्रपोजल आया तो कोई दुविधा?

जवाब: नहीं, कंटेंट और उनकी टीम को देखकर मैंने हामी भरी और जब एम गनी से बातचीत हुई, तो पता चला कि वो लंबे समय से थिएटर करते रहे हैं।

सवाल: मट्टो के किरदार के लिए खुद को तैयार करना कितना मुश्किल रहा?

जवाब: कहानी ब्रज में लिखी गई थी। ये मथुरा की कहानी है। शूटिंग मथुरा से सटे आयराखेड़ा गांव में हुई है। बतौर एक्टर किसी किरदार में घुसने का एक प्रोसेस होता है।

इसके लिए कई महीने मथुरा जाकर असली दिहाड़ी मजदूरों के बीच बैठता था। उनके हर काम को मैंने सीखा।

दरअसल, मैं एक्टिंग के कई वर्कशॉप, ट्रेनिंग करता रहता हूं ताकि बतौर डायरेक्टर भी एक्टर के साथ बातचीत करने का तरीका पता हो।

इस फिल्म के अलावा कुछ शॉर्ट फिल्में जल्द आएंगी, जिनमें मैंने एक्टिंग की है।

सवाल: दर्शकों को इस फिल्म में क्या देखने को मिलेगा?

जवाब: जब डायरेक्टर एम गनी ने मुझे स्क्रिप्ट भेजी थी, तो कुछ दिनों तक मेरे पास ये पड़ी रही। एक दिन उनका फोन आया कि आपने इसे पढ़ा या नहीं। मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी, तो इसमें आधे हिंदुस्तान की कहानी दिखी। जो हर वक्त हमारे लिए घर, फ्लाइओवर, सड़क बनाता रहता है। सब्जियां बेचता है, सिक्योरिटी गार्ड का काम करता है, लेकिन इनके बारे में हम सोचते भी नहीं है। पास से गुजर जाए तो मुड़कर देखते भी नहीं हैं।

जब कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन के दौरान अचानक हजारों लोग सड़कों पर अपने घर के लिए निकल पड़ते हैं, तब हमें पता चलता है कि… अच्छा ये लोग भी थे।

साइकिल के इर्द-गिर्द एक मजदूर की जिंदगी कैसे अटकी रहती है। मट्टो की साइकिल इसी पर बेस्ड है। 20 साल पुरानी उसकी साइकिल हो गई है और बेटी 19 साल की हो चली है। यदि रोजाना समय से काम पर पहुंच जाएगा, तो उसे काम मिलेगा, दिहाड़ी मिलेगी, नहीं तो परिवार भूखा रहेगा। एक दिहाड़ी मजदूर की पूरी जद्दोजहद इस फिल्म में दिखती है।

सवाल: इसे OTT पर भी तो रिलीज किया जा सकता था?

जवाब: हां, शूटिंग कोरोना से पहले पूरी हो चुकी थी। कोरोना के दौरान इसे बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भेजा गया था, जहां इसकी वर्चुअल स्क्रिनिंग हुई थी। दो साल तक सिनेमा हॉल बंद थे, तो हम इस फिल्म को रिलीज नहीं कर पाएं।

कंटेंट डिसाइड करने वालों को लगा कि ये OTT के लिहाज से बहुत ही ड्राई फिल्म है। लोग छोटे स्क्रीन पर इसे पसंद नहीं करेंगे।


सवाल: आपकी दूसरी फिल्म बतौर डायरेक्टर ‘दामुल’ और बतौर एक्टर ‘मट्टो की साइकिल’ में क्या समानताएं दिखती हैं?

जवाब: दोनों फिल्म में सिर्फ सब्जेक्ट अलग हैं। वो भी हमारे समाज से जुड़ा रियलिस्टिक सब्जेक्ट था, ये भी वही है। सिनेमैटिक लैंग्वेज में कहूं तो मट्टो थोड़ा रिच है, पुष्ट है। फिल्म ‘दामुल’ हार्ड हिटिंग और बहुत ही डार्क है।

सवाल: प्रकाश झा एक ‘स्टाइल ऑफ सिनेमा’ का नाम भी है। राजनीति, आरक्षण जैसी कोई फिल्म आ रही है?

जवाब: बिल्कुल, इस पर हम काम कर रहे हैं। अगले साल तक इस तरह की एक फिल्म के आने की उम्मीद है। इस साल ‘लाल बत्ती’ वेब सीरीज पर काम चल रहा है।

सवाल: क्या फिल्मों को हिट कराने के लिए विवाद खड़ा करना बॉलीवुड की नई स्ट्रैटजी है?

जवाब: मैं इन चीजों पर ध्यान नहीं देता हूं। अपने काम में लगा रहता हूं।

सवाल: ‘आश्रम’ वेब सीरीज को लेकर आरोप है कि आप एक धर्म को टारगेट कर रहे हैं?

जवाब: इसमें किसी भी धर्म का कहीं पर कोई जिक्र नहीं है। मुझे जहां कहानी मिलती है, अच्छी लगती है, बनाता हूं। जो बाबा बनकर दूसरों के साथ छल करते हैं, ये कहानी उनकी है। धर्म को मैं भी मानता हूं। मेरे लिए भी पूज्य है।

लोगों को यदि इस सीरीज से दिक्कत होती, तो सबसे ज्यादा देखी जाने वाली सीरीज नहीं होती। दरअसल, मैं कहानियां ढूंढता हूं। आज भी ये नहीं सोचता हूं कि राजनीतिक या सामाजिक मुद्दों पर ही फिल्में बनाऊंगा।


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